"हैवान"
सूरज हर रोज निकलता है, दिन हर रोज़ बदलते है, फूल फिर खिलते हैं और छोटी छोटी कालिया पत्तो को ओट से दुनिया देखने को बेताब सी झांका करती है... लेकीन उस आदमी का क्या जो वक्त की एक चुटकी मात्र से आपनी हैवानियत पर उतर आता है? होश में होकर भी बेहोश रहता है? और उन महिलाओं का क्या जो आए दिन घरेलू हिंसा का शिकार होती है? जुलाई का महीना मानसून ने समय से कुछ पहले दस्तक दे दी हैं, कुछ हो न हो प्यार करने और प्यार जताने का असली मौसम तो यही होता है, जब सावन दस्तक देने को तैयार हरियाली को अपनी बाहों में समेटे हुए कुछ दूरी पर आस की नज़रों से खड़ा हमारे साथ साथ मानसून का आनन्द ले रहा होता है। नीमा दिनभर की थकान के बाद भी अचानक हुई झमाझम बारिश का लुत्फ रमेश के साथ उठाने के लिए किचन में पकौड़ियां छान रहीं थी। रमेश कुछ दिनों से उदास चल रहा है, तभी नीमा ने सोचा देश में तो लॉकडाउन है ही चलो दिल के रिश्तों को ही सुधार लिया जाए जो जिंदगी की भागदौड़ में कहीं खो गए थे। रमेश शाम के समय बालकनी में रक्खे झूले पर बैठा, कुछ सोच रहा था, ये वहीं झूला था जो सबसे पहले इस घर में आया था, नीमा की सैलरी से और यहां दोनों ...