"अधूरा मगर पूरा इश्क़ "
कहीं किसी रोज़ ये सूरज भी ढल जायेगा,
और एक दिन फिर तुझे मेरी याद आयेगी
कभी मैं आई थी तेरे पास
कभी तू चले आना मेरा प्यार अधूरा होके भी पूरा हो जायेगा।।
– तुम्हारी बबिता
कुछ चंद लाइनें बबिता ने अपनी शादी के वक्त उस डायरी में लिख दी थी इस उम्मीद में के कभी राजन इसे पढ़ेगा ज़रूर... और फिर अगले दिन अपने एक अंजान व्यक्ति के साथ उसका विवाह सारे रीतिरिवाज़ के साथ कर दिया गया।
बबीता और राजन एक दूसरे से बेहद प्रेम करते थे...लेकिन राजन
एक बहुत ही गरीब घर से था अतः वो बबीता को सपने तो दिखा सकता है लेकिन उन्हें पूरा नहीं कर सकता....
दोनों के बीच जो अंडरस्टैंडिंग थी, वो देखते ही बनती थी और तालमेल इतना अच्छा होता भी क्यों ना, पीछले पांच सालों से वो दोनो साथ जो थे...इस दौरान बहुत से दिन देखे दोनों ने कभी खुशी तो कभी गम...
प्यार पागल होता है और जहां प्यार होता है वहां न धन न दौलत, न जात न पात, न उम्र न दराज किसी और चीज़ के बारे में सोचने के लिए वक्त ही कहां होता है.... वक्त गुजरता जाता है और प्यारा गहरा होता जाता है.... फिर उस प्यार को समाज की नज़र लग जाती है... और सारे वादे सारे सपने सारी उम्मीदें कांच की तरह टूट जाती है।
–राजन
बबीता ने राजन को शायर बनते भी देखा कैसे टूटी फूटी कविता लिखते लिखते अब वो बहुत ही अच्छी कविताएं लिखने लगा था और बबीता से अक्सर बोलता था, “ ये जो मेरा शायर है ना ये सिर्फ तुम्हारे लिए है मै अपनी शायरी का राजदार किसी और को नहीं बना सकता।"
बबीता इस बात पर मुस्कुरा देती और बिना कुछ कहे राजन की आंखों में देखकर बहुत कुछ कह जाती थी...
आज बबीता का रिश्ता कहीं और तय हो गया बिना उसकी इच्छा जाने, बबीता को पता था राजन अभी शादी के लिए तैयार नहीं है, फिर भी एक टूटी फूटी आस लिए वो रात में घर से भाग गई और सीधे राजन के पास पहुंच गई और बोली राजन मै तुम्हारे बिना नहीं रह सकती मुझसे शादी कर लो....राजन ने बबीता को बहुत समझाया कि अभी तो वो खुद का खर्च नहीं उठा पा रहा है, तुम्हारा कैसे उठायेगा... नहीं राजन वो हम दोनों मिलकर देख लेंगे प्लीज चलो ना हम शादी कर लेते है।
राजन सुनो बबीता ऐसे अचानक से और जल्दबाजी में कुछ भी सही नहीं होता एक काम करो तुम घर जाओ हम बात करते है कल इस बारे में....
राजन अगर आज मै चली गई तो कभी वापस नहीं आऊंगी गुमसुम सी बबिता बोली और उसकी आंखो से उम्मीद का आखिरी आंसू छलक गया कल मेरी शादी ये कहते वक्त तो उसके पांव के नीचे से मानों ज़मीन ही सरक गई हो...
एक तरफ़ राजन को बबीता पर प्यार भी आ रहा था तो दूसरी तरफ खुद की लाचारी पर शर्म भी आ रही थी...की जो आदमी अपनी सिगरेट तक उधार में पीता है वो भला बबीता जैसी अमीर लड़की के साथ उम्र कैसे गुज़ार सकता है...
राजन ने दिल पर पत्थर रखकर बोला... कह रहा हूं ना चली जाओ घर, बात नहीं समझ आती तुम्हें...नहीं आओगी ना आज के बाद तो मत आना अभी के लिए मेरा पीछा छोड़ो मै नहीं कर सकता तुमसे शादी वादी....
बबीता एक टक राजन की आंखों में देखती रही और वो सब पढ़ लिया जो राजन बोल नहीं रहा था चुपचाप अपने शौल को संभालते हुए बबीता वापस अपने घर चली आईं....
15 साल बाद....
राजन एक नामी वकील बन चुका है और आज भी उस शहर में ही रह रहा है जहां उसने बबिता के साथ अपनी बेरोजगारी के दिन बिताए थे... और बबीता एक कॉलेज में प्रोफेसर है...बबीता भले ही अपना अतीत भूल चुकी हो लेकिन उस शहर को कैसे भूलती जहां उसने प्यार को जाना था पहचाना था... आज उसका तबदला फिर से मसूरी में हो गया, हाथ में ट्रांसफर लेटर लिए मसूरी का नाम देखते ही एक बार को वो किसी और दुनिया में खो गई...
उधर राजन अक्सर तुलसी उपवन में एक चक्कर लगा ही आया करता था... शायद उसे अभी भी आस थी बबिता 15 साल बाद फ़िर एक बार यहां आयेगी... और इन सूख चुकी वादियां एक बार फिर से खिल उठेंगी.... उसकी मुस्कुराट पर मुस्कुरा उठेगी।
ऊपर से सख्त दिखने वाला जज जो सरा दिन लोगों के मास्ले सुलझाया करता है आज तक अपना दिल के सूनेपन को नहीं सुलझा पाया था....
राजन और बबिता जहां घंटो गुज़ारा करते थे वहां की ज़मीन राजन ने ख़रीद ली और शहर से दूर उस जगह पर घास फूउंस की एक झोपड़ी बना ली जो नदी से कुछ दूरी पर ही बना रखी थी....
यहां ये झोपड़ी बनाने का एक और कारण था बबीता और राजन दोनों को ही हराभरा सुनसान नदी किनारे का वातावरण और ऐसे में होने वाली बारिश बहुत पसंद थी....
अपनी खिड़की पास लगी आराम कुर्सी में में बैठा राजन एक किताब पढ़ रहा था...तभी पानी की एक बूंद टप से गिरी और राजन के हाथों को छूते हुए किताब के पन्ने पर आ गिरी...
"पन्ने पर लिखा था....आज से पंद्रह साल पहले.... और आगे की कहानी लिखी थी"
उसको पढ़ते ही राजन एक पल को पुराने दिनों में खो गए जहां राजन इसी जगह जमीन पर बैठा किताब पढ़ रहा था और बबिता उसकी पंथी पर सर रखकर अपने चेहरे को पल्लू से ढके हुए लेटी थी....
बबीता ने मज़े मज़े में पूछा राजन हम शादी के बाद कहां रहेंगे राजन ने भी चुटकी लेते हुए बोला...देखो तुम तो जानती हो पैसे वैसे तो है नहीं मेरे पास... हां लेकिन इतना कर सकता हूं यही नदी किनारे एक झोपड़ी बना दूंगा ...दोनों जने टपकती छत के नीचे बारिश के मौसम में अपनी पुरानी यादों को ताजा करेंगे...
वो कुछ सोच ही रहा था तभी फोन की घंटी बजी और राजन अतीत से बाहर आ गया....
फोन पर किसी से बात करते हुए राजन बोला...अरे तू क्यों परेशान हो रहा है...
मै भूल चुका हूं अपने अतीत को अब मुझे किसी के नंबर की जरूरत नहीं है....
दूसरी तरफ - भाई मैंने नंबर भेज दिया है आगे तेरी मर्जी... ओर फ़ोन कट कर देता है।
उस वक्त कम्युनिकेशन का मीडियम सिर्फ कीपैड फ़ोन हुआ करता था व्हाट्स ऐप प्रचलन से बाहर था...
आज जब राजन ने बबीता का नंबर सेव किया तो देखा ये नंबर व्हाट्स ऐप पर भी है...और उसके about me कॉलम पर लिखा हुआ है –
कहीं किसी रोज़ ये सूरज भी ढल जायेगा
और एक दिन फिर तुझे मेरी याद आयेगी
कभी मैं आई थी तेरे पास
कभी तू चले आना मेरा प्यार अधूरा होके भी पूरा हो जायेगा।।
ये पढ़ते ही राजन को एक बार लगा ये उसके लिए ही लिखा गया है फिर मन ही मन तय कर लिया – इतना वक्त हो गया अब तो वो मुझे भूल चुकी होगी।
फ़िर बड़ी हिम्मत करके राजन ने फोन मिला ही दिया... दूसरी तरफ़ से आप जिस नंबर से संपर्क करना चाहते है उस पर incoming ki Call की सुविधा उपलब्ध नहीं है.... और फोन कट गया...
राजन ने राहत की सांस ली अगर बबीता फोन उठा लेती तो वो उससे क्या बोलता ?....
बारिश बंद हो चुकी थी राजन सब्जी लेने के लिए बाहर निकला तो एक महिला शॉल ओढ़े नदी की तरफ़ टकटकी लगाएं पता नही क्या देख रही थी...पहले राजन ने सोचा की पूछे जाके कही आत्महत्या करने तो नहीं आई है...फिर न जानें क्या सोचकर वो किसी और काम के लिए निकल गया... रास्ते में उसे एक डायरी मिली... डेयरी काफ़ी पुरानी और कुछ जानी पहचानी थी राजन समझ गया...ये डायरी तो बबीता की है, मतलब वो लड़की बाबिता ही है....राजन ने डेयरी खोली तो उसके आखिरी पेज पर भी वहीं व्हाट्स ऐप वाली कुछ लाइन लिखी थी और उसमें एक तारीख़ डली थी जो काफ़ी वक्त बीत जानें की वजह से धुंधली हो गई थी।
राजन तुरंत उस सरोवर की तरफ बढ़ा तो देखा बाबितर अभी भी वैसे ही खड़ी नदी को टकटकी लगाकर दिखाए जा रही थी....
राजन वहीं चुप चाप उसके पीछे वैसे ही खड़ा हो गया जैसे पहले कभी खड़ा हुआ करता था कुछ देर बाद जब बबीता मुड़ी तो ऐसे खड़े उस व्यक्ति को देखकर थोड़ा डर गई और सकपका के थोड़ा पीछे हो गई।
बबीता राजन को पहचान न पाई थी क्योंकि राजन ने बबीता को छोड़ा था तब राजन बहुत गरीब था उसके चेहरे पर न तो ये वाला सुकून था और न ही पैसों की चमक।
राजन ने अपना हाथ बढ़ा कर बबीता को उसकी डेयरी थमा दी और बोला शायद ये वहां पीछे गिर गई थी...
बबीता ने डायरी हाथ में ली और वापस जानें लगी... राजन ने धीमे से दबी आवाज़ में बोला बबीता... बबीता को ऐसा लगा जैसे राजन ने उसे आवाज़ लगाई हो...
बबीता पीछे मुड़ी और पूछा आपको मेरा नाम...?
अरे वो डायरी में लिखा था...वो मुझे पता नही था ये डायरी किसकी है इसलिए मैंने इसे थोड़ा सा पढ़ा तो एक नज़्म के नीचे आपका नाम दिख गया...
राजन – लगता है आपको शेर ओ शायरी का बहुत शौक है अगर आप बुरा न मानें तो यहां पास में ही मेरी छोटी सा घर है...क्या आप मेरे साथ चाय पीना पसंद करेंगी...
बबीता बहुत देर से यहां खड़ी थी उसको कुछ थकान हो गई थी इसलिए उसने चाय के लिए मना नहीं किया....
राजन ने बबीता को अपने घर की ओर का रास्ता दिखाया और उसके पीछे पीछे चल दिया...
बबीता जैसे ही झोपड़ी के सामने पहुंची और उसके आस पास देखा तो उसे राजन वाली बात याद आ गई...
कुछ देर के लिए उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके पांव वहीं घास में जम रहे हो वो चाह कर भी पांव आगे न बढ़ा सकी तभी राजन वहां आया और झोपड़ी का ताला खोलकर, बबीता को अंदर आने के लिए कहां....
और वो चाय बनाने चला गया, जब राजन चाय लेकर आया तो बबीता उसे बहुत देर तक देखती रही और मन ही मन सोचती रही वही चाल, वही ढाल और ये जगह जगह भी तो वही है, कही ये आदमी राजन तो नहीं? जैसे ही बबिता ने चाय के प्याले को अपने होठो से लगाया, तो वो बर्बस ही बोल पड़ी तुम राजन हो न?
राजन ने, बिना कुछ बोले बस मुस्कुरा दिया... उसकी इस मुस्कराहट से साफ़ बयां हो गया था, राजन बोलना चाहता था हाँ बबिता मै हूँ तुम्हारा राजन लेकिन वो चुप रहा...शायद वो समझ गया था की प्यार का असली मतलब किसी को पा लेना ही नहीं होता कभी कभी किसी को खो देना भी प्यार का असली मतलब समझा देता है।
कुछ साल बाद राजन ने भी शादी कर लिया वैसे तो वो खुश रहता हैं बस कभी कभी अपनी पुरानी दुनिया की याद में मिट्टी के बनें उस रैंन बसेरे की सैर को निकल जाता हैं।।
अंदाज़ की कलम से अधुरा मगर पूरा इश्क़.
ऐसी और भी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर टैप करे:
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें