"अंदाज़ ऐ जिंदगी"

 


एक अंजान शहर और उस शहर के अंजान लोग, बहुत मुश्किल होता है एक अंजान शहर के लोगों में घुलना - मिलना और उनके कल्चरल के साथ साथ अपने कल्चरल और अपनी बंदिशों को ध्यान में रखना लेकीन सपनों को पूरा करने के लिए इंसान क्या कुछ नही करता....


ये कहानी है एक छोटे से गांव से अपने बड़े सपनों को हकीकत बनाने आई तान्या की ...

माता पिता बचपन में कहते थे बेटा राह चलते लोगों से बात मत करना, वो लोग अच्छे नहीं होते, बच्चों को किडनैप करके ले जाते है।

माता पिता की इस बात को वो नकारती उससे पहले ही उसने टी०वी० में एक ख़बर देखी की कैसे कुछ दरिंदे छोटी बच्चियों का रेप कर देते है, इतना ही नही कुछ लोग तो जिस्मों का व्यापार भी करते हैं।

तान्या ये सब ही देख सुनकर बड़ी हो रही थी, उसने दुनिया को, कुछ माता पिता की नज़रों से, कुछ किताबों से, लेकिन उससे भी ज्यादा टी०वी० देखकर जाना, क्योंकि अभी इतनी बड़ी नही हुई थी की लोगों के बीच में रहकर लोगों को जान सके।

बचपन से स्कूल में अच्छे दोस्त मिले, अच्छे टीचर मिले शायद उसकी क़िस्मत अच्छी थी की जो वो देखती और सुनती आ रही थी अभी एक  वैसी किसी घटना से उसका सामना नहीं हुआ था।

आज तान्या 21 साल की हो गई और अब उसकी ज़िंदगी करवट बदल रही थी, बचपन से मीडिया में जाने का सपना देख कर बड़ी हुई तान्या का दाखिला मास कॉम के अच्छे संस्थान में हो गया था।

घर से निकलने से पहले उसकी स्पेशल क्लास लगी, मम्मा और पापा के साथ, वहीं एक बात जो बचपन से समझाते आएं है जिसे उसने टी०वी० पर भी देखा था, अपने माता पिता की बात बहुत ध्यान से सुनी और गांठ बांध ली की, नए शहर में क्या करना है, कैसे रहना है, किससे बात करनी हैं और किससे नहीं, अपनी हर बात को लेकर क्लियर कट थी ।

लेकीन ज़िंदगी के असली अनुभव तो वो अब करने वाली थी, जहां सही और गलत की परिभाषा सही गलत से इतर कुछ और ही होती है और वो परिभाषा हमें कोई किताब नहीं बल्की ज़िन्दगी सिखाती है।

किराए का पहला कमरा –

"पड़ोसी" ये शब्द भले ही बहुत छोटा हो, लेकिन इसकी भूमिका बहुत बड़ी होती है, खुशकिस्मती से तान्या को बहुत अच्छे पड़ोसी मिले,जो उसका बहुत ख्याल रखते थे और उसको एक परिवार की तरह मानते थे बदले में तान्या का भी कुछ फर्ज़ था, जिसके बदले में क्लियर कट तान्या ने अपनी जिंदगी का पहला रूल तोड़ा, यह बोलकर की," पड़ोसी है अब इनसे भी बात नहीं करूंगी तो कहां जाऊंगी?".....

ये तो पहली घटना थी, अभी कॉलेज की रंग बिरंगी ज़िंदगी से रूबारू होना तो बाकी था।

आज कॉलेज का चौथा दिन था और तान्या दिल्ली के कल्चरल से पूरी तरह परेशान हो चुकी थी... आज जब शाम के वक्त वो अपने कुछ दोस्तों के साथ चाय पी रही थी, तभी एक लड़का तान्या के पास खड़े होकर अपने किसी अन्य दोस्त से डबल मीनिंग में गाली देकर बात कर रहा था, तान्या को उसका बात करने का ये लहज़ा बिल्कुल भी पसंद नही आया , उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था, बिना आस पास देखें तान्या ने उस लड़के को ऐसी खरी खोटी सुनाई की वो लड़का बिना कुछ बोले, चुप चाप वहां से चला गया...

लेकिन शायद वो भूल गई थी की वो दिल्ली जैसे शहर में है, यहां वो किसका किसका मुंह बंद करेगी, क्या लड़की और क्या लड़का, सबके सब यहां ऐसे ही बाते करते है, यहां किसी दोस्त को गाली देकर बात करने का मतलब उसे बेइज़्जत करना नही होता, बल्की यह दोस्ती की गहराई को दर्शाता है, वैसे तो ये कल्चरल  तान्या को बिल्कुल भी पसंद नहीं था इसके बावजूद कब वो उस नपसंद कल्चरल की आदि हो गई, उसे भी यह पता नही चला।

जिस लड़के को तान्या ने बिना जानें क्या कुछ नही बोल दिया था आज जब भी वो उस दिन की याद करती हैं तो उसे हंसी आ जाती है और इस तरह  क्लियर कट तान्या का एक और रूल टूट गया।

अच्छे दोस्त और अच्छे पड़ोसी के साथ तो तान्या की ज़िंदगी कट रही थी की ज़िन्दगी ने फ़िर एक बार करवट बदली और ज़िन्दगी में एक और मोड़ आ गया ये वो मोड़ था जिससे वो कभी भी रूबारू नही होना चाहती थी।

और जिसके लिए तान्या को स्पेशली समझाया गया था, किसी लड़के से दोस्ती होना तो ठीक है, लेकीन उससे ज्यादा किसी भी लड़के को अपनी लाइफ में इंटरफेयर मत करने देना... माता पिता की इस बात को लेकर तान्या बिल्कुल सहमत थी शायद इस वजह से ही सारी बातों से ज्यादा इस बात को गांठ बांध रक्खा था।

लेकिन जब वो खुद को याद दिलाती बस यहीं एक काम नहीं करना है तो कहीं न कहीं वो किसी को अपनी ज़िंदगी में आकर्षित कर रही होती थी।
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दिल्ली में अंजान लोगों से मिलना उनसे बातचीत करने से एक बात तो समझ आ गई थी की दुनिया उतनी भी ख़राब नही है जितना वो अपने से बड़े लोगों से सुनती आई है...जिंदगी की कश्मकश से रूबरू होते हुए तान्या जिंदगी के अंजान ट्रैक में आगे बढ़ रही थी और हर एक मोड़ के बाद उसका सामना इस खूबसूरत दुनिया से हो रहा था....

तान्या को दिल्ली में रहते हुए 2 साल गुज़र गए,वो कहते है न अनुभव हमें एक शिक्षक से ज्यादा सिखाता है, यहीं तान्या के साथ भी हुआ था वो तान्या जो घर से बहुत ही संकीर्ण सोच के साथ निकली थी आज वो पुरी तरह बदल चुकी थी...उसका अनुभव ये कहने लगा था की टी०वी० में जो दुनिया बहुत बुरी दिखाई जाती है ये दुनिया उतनी भी बुरी नही होती है।

अगर ये भाग अच्छा लगा तो मुझे सूचित करे जिससे की मैं इस कहानी का अगला भाग लिखने की प्रेरणा मिले।


“मुस्कुराने की कोई तो वजह दो,
अगर प्यार सजा है तो सजा दो...”


तान्या एक के बाद एक अपने ही बनाये हुए नियम तोड़ रही थी क्योकि वेर्चुअल दुनिया से परे एक और दुनिया थी जो खुबसूरत होने के साथ साथ जटिल भी थी और हर एक कदम पर कुछ न कुछ सिखा रही थी...


तान्या से मेरी मुलाक़ात मास कॉम के उसी कॉलेज में हुई थी जहां उसने खुद के बनाए हुए नियम तोड़ने सीखे थे ।

हमारे कोर्सेस अलग थे, हमारे दोस्त अलग थे लेकिन हमारा शहर एक था कुछ समय बाद हम एक ही रूम में शिफ्ट हो गए और इस तरह से मुझे तान्या को जानने का मौका मिला।


कुछ ख़ुद के अनुभव से , कुछ उसके साथ रहकर, मै एक बात तो जान गई थी की एक लड़की कभी भी पैसे की चकाचौंध से किसी लड़के की तरफ़ आकर्षित नहीं होती, हर लड़की को एक केयर करने वाला लड़का चाहिए होता है, जो उसे भीड़ में सेफ फील करा सके, बिना किसी की परवाह किए उसका हाथ थाम सके, बाकी तो जिंदगी एक संघर्ष है रोते गाते, हंसते मुस्कुराते बस चलती ही रहती है।

मैं तान्या और मेरे कुछ दोस्त हम दिल्ली की धड़कन कहीं जानें वाली मेट्रो का ही सहारा लिया करते थे अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए...

अक्सर दूसरे शहरों से दिल्ली में पढ़ाई करने आए छात्र लक्ष्मीनगर, न्यू अशोक नगर, अक्षरधाम, पांडव नगर आदि जगाहों पर कमरा या पीजी किराए पर लेकर रहते थे क्योंकि यहां कम दाम में अच्छे फ्लैट और रूम मिल जाया करते है।

मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन से हम सब साथ ही अपने अपने घर की ओर जाया करते थे।

मंडी हाऊस हम आज़ाद परिंदों का गढ़ हुआ करता था, हमें खुद भी नहीं पता होता था, अपने सपनों को हकीकत बनाने की दौड़ में हम कितना वक्त खुली आंखों से सपने देखते हुए मंडी हाउस में ही बिता दिया करते थे।"

मंडी हाऊस पर ही संदीप और तान्या की मुलाकात हुई थी संदीप पीजी डिप्लोमा कर रहा था और तान्या यूजी डिप्लोमा, यहां सिर्फ़ संदीप और तान्या ही नहीं बहुत लोगों के दिल बहुत से लोगों पर आए, लेकिन कॉलेज के शुरुआती दिनों में हमें नही पता होता है कौन हमारे साथ बहुत आगे जानें वाला है और कौन बस दो पल की दोस्ती निभा रहा है।

तान्या और संदीप धीरे धीरे एक दूसरे के आदि हो रहे थे, ऐसा पूरा कॉलेज बोल रहा था लेकिन मैं अभी भी इन बातों से अंजान थी एक बार को मुझे लगा, कुछ तो है? मैंने जानने की कोशिश की लेकिन मेरे हाथ निराशा ही लगी।

शायद संदीप को भी इस बात का पता नहीं चला था कब वो तान्या के साथ रहते हुए और एक अनजान शहर में उसकी देखभाल करते हुए उससे प्यार करने लगा था।

दोनों ही एक दूसरे को पसंद कर रहे थे लेकिन अभी तक दिल की बात जुबां पर नहीं आई थी।

दो नियमों को तोड़ने के बाद ये तीसरा नियम था जिसे तोड़कर वो एक बार और खुश हुई थी.

पुराने नियमों को तोड़ना, नए नियम बनाना और फ़िर ख़ुद की गलती से सिखना ये दुनिया का सबसे खूबसूरत अनुभव होता हैं।

इसलिए बच्चों को टोकिए मत बस उन्हें सही  रास्ता दिखाकर उनके फैसलों का सम्मान करिए।

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