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"अंदाज़ ऐ जिंदगी"

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  एक अंजान शहर और उस शहर के अंजान लोग, बहुत मुश्किल होता है एक अंजान शहर के लोगों में घुलना - मिलना और उनके कल्चरल के साथ साथ अपने कल्चरल और अपनी बंदिशों को ध्यान में रखना लेकीन सपनों को पूरा करने के लिए इंसान क्या कुछ नही करता.... ये कहानी है एक छोटे से गांव से अपने बड़े सपनों को हकीकत बनाने आई तान्या की ... माता पिता बचपन में कहते थे बेटा राह चलते लोगों से बात मत करना, वो लोग अच्छे नहीं होते, बच्चों को किडनैप करके ले जाते है। माता पिता की इस बात को वो नकारती उससे पहले ही उसने टी०वी० में एक ख़बर देखी की कैसे कुछ दरिंदे छोटी बच्चियों का रेप कर देते है, इतना ही नही कुछ लोग तो जिस्मों का व्यापार भी करते हैं। तान्या ये सब ही देख सुनकर बड़ी हो रही थी, उसने दुनिया को, कुछ माता पिता की नज़रों से, कुछ किताबों से, लेकिन उससे भी ज्यादा टी०वी० देखकर जाना, क्योंकि अभी इतनी बड़ी नही हुई थी की लोगों के बीच में रहकर लोगों को जान सके। बचपन से स्कूल में अच्छे दोस्त मिले, अच्छे टीचर मिले शायद उसकी क़िस्मत अच्छी थी की जो वो देखती और सुनती आ रही थी अभी एक  वैसी किसी घटना से उसका सामना नहीं हुआ थ...

"अधूरा मगर पूरा इश्क़ "

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  कहीं किसी रोज़ ये सूरज भी ढल जायेगा, और एक दिन फिर तुझे मेरी याद आयेगी कभी मैं आई थी तेरे पास कभी तू चले आना मेरा प्यार अधूरा होके भी पूरा हो जायेगा।।                                                                  – तुम्हारी बबिता कुछ चंद लाइनें बबिता ने अपनी शादी के वक्त उस डायरी में लिख दी थी इस उम्मीद में के कभी राजन इसे पढ़ेगा ज़रूर... और फिर अगले दिन अपने एक अंजान व्यक्ति के साथ उसका विवाह सारे रीतिरिवाज़ के साथ कर दिया गया। बबीता और राजन एक दूसरे से बेहद प्रेम करते थे...लेकिन राजन एक बहुत ही गरीब घर से था अतः वो बबीता को सपने तो दिखा सकता है लेकिन उन्हें पूरा नहीं कर सकता.... दोनों के बीच जो अंडरस्टैंडिंग थी, वो देखते ही बनती थी और तालमेल इतना अच्छा होता भी ...

लव@ट्रेन

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आज गरिमा पापा के साथ इलाहबाद ज रही थी... उसने सोचा भी नही था उसे उसका पहला प्यार ट्रेन मे मिलेगा। सुबह 6 बजे की ट्रेन थी। पापा ने रास्ते से कुछ फल लिये और गरिमा ने एक न्यूज़ पपेर.....ट्रेन की बोगी मे चार लोगों वाली सीट मे गरिमा बैठी और खिड़की वाली सीट मे उसके पापा बैठ गये। ट्रेन अपने गन्तव्य के लिये रवाना हो गयी..... उस बोगी मे तीन चार खिड़की वाली सीट छोड़कर कुछ लड़के बैठे थे,जो कानपुर मे रह रहे थे और त्योहार मनाने अपने घर इलाहबाद ज रहे थे। गरिमा की नज़र एक लड़के पर पड़ी जो मोटा तो था और बिल्कुल भी आकर्षक नही था...अतः गरिमा की नज़र जिस तरह घूमते हुए उस लड़के तक गयी थी वैसे ही घूमते हुए वापस अ गयी। सफ़र शुरू हुए एक घंटे गुज़र चुके थे..कुछ देर बाद गरिमा की नज़र फिर उस तरफ गयी इसबार एक खूबसूरत स लड़का उस सीट पर बैठा था...जो खुद भी गरिमा की तरफ ही देख रहा था...अब गरिमा की आँखे परेशा न हो गयी...पहले तो वो समझ न पायी इस क्रिया की क्या प्रतिक्रिया दे। फिर कुछ देर बाद गरिमा भी उसकी ओर देखने लगी....और देखते ही देखते न जाने कब आँखे चार हो गयी प्रिया का खुद पर कंट्रोल न रहा था...वो चाह रही थी ये...

'कॉन्वेंट स्कूल'

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                               'कॉन्वेंट स्कूल मेघा की एंट्री..मेघा ग्रेजुएट हो चुकी थी ।आगे की पढ़ाई के लिये उसको पैसो की जरूरत थी।उसने सोचा क्यो न किसी स्कूल मे पढ़ा कर कुछ पैसे कमा ले फिर मास्टर्स मे दाखिला ले लेगी,इसी के चलते उसने दो तीन स्कूलों मे आर्जी लगा दी..और कुछ मे इंटरव्यू भी पास कर लिया...भले ही उसने यूपी बोर्ड से पढ़ाई की थी पर बैचलर डिग्री लेने के बाद अंग्रेज़ी मे भी उसकी पकड़ अच्छी हो गयी थी, अतः उसने शहर के कॉन्वेन्ट स्कूलों मे भी अर्जी लगायी....उनमे से एक स्कूल मे आर्जी लगते ही  इंटरव्यू कॉल भी अ गया। मेघा कॉन्फिडेंस से भारी हुई थी...वो तो उस बड़े स्कूल में पढ़ाने के सपने भी देखने लगी थी...पर जब वो अंदर जाकर बाहर निकली तो उसने अपना मूड़ बदल लिया था...उसने सीधे और साफ लफ़्ज़ों मे कहा मुझे इस स्कूल मे नही पढ़ाना हैं..पता हैं क्यो.. वो जैसे ही इंटरव्यू के लिये ऑफिस में एंटर हुई... तो ....प्रिंसिपल ने पहला सवाल पूछा -अंग्रेजी में... आपकी की स्कूलिंग कहाँ से हुई हैं..जैसे ही मेघा ने अपने स...

"प्यार" ज़िंदगी की हद के पार

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प्या र  कब कहाँ और किससे हो जाये ये किसी को नही पता होता। ये कहानी है प्रियंक की जिसकी उम्र लगभग 19 वर्ष के आसपास होगी बचपन से हॉलीवुड की वो फिल्मे देखकर बड़ा हुआ है - जो  कहानी को भी हक़ीक़त बना देते है वहीं दूसरी तरफ बॉलीवुड की  ऐसी मसाला फिल्में जिनमें प्यार ऐसे परोसा जाता है जैसे किसी इंसान को ज़िन्दगी मिलने के दो ही मक़सद  है पहला इस दुनिया मे आना और दूसरा प्यार करके बॉलीवुड का नाम रौशन करना। और प्रियंक ने भी एक नाम रौशन करने वाला काम किया प्रियंक ने भी प्यार किया पर ऐसा प्यार जो दुनिया के  रीतिरिवाज़ों और  समाज के दायरे से बिल्कुल परे था। प्रियंक जिस उम्र में था वहां बचपन पीछे छूटता औऱ जवानी हाथ थाम कर जिंदगी के नए रंग दिखाने को बेताब होती है। आज प्रियंक के मन मे अजीब सी हलचल थी उसे ऐसा लग रहा था कि  उसे रिमझिम से प्यार हो गया है । जिससे वो रोज झगड़ता है, परेशान करता है  और कभी कभी अपने दिल की सारी बाते कह डालता है। कभी उससे गले लगकर घंटो, उसके साथ चुपचाप खड़ा रहता। अब आप इसे प्यार का कहो या दोस्ती का रिश्ता, रिमझिम भी प्रियंक को चुपच...