लव@ट्रेन


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आज गरिमा पापा के साथ इलाहबाद ज रही थी...
उसने सोचा भी नही था उसे उसका पहला प्यार ट्रेन मे मिलेगा।
सुबह 6 बजे की ट्रेन थी। पापा ने रास्ते से कुछ फल लिये और गरिमा ने एक न्यूज़ पपेर.....ट्रेन की बोगी मे चार लोगों वाली सीट मे गरिमा बैठी और खिड़की वाली सीट मे उसके पापा बैठ गये।
ट्रेन अपने गन्तव्य के लिये रवाना हो गयी.....
उस बोगी मे तीन चार खिड़की वाली सीट छोड़कर कुछ लड़के बैठे थे,जो कानपुर मे रह रहे थे और
त्योहार मनाने अपने घर इलाहबाद ज रहे थे।
गरिमा की नज़र एक लड़के पर पड़ी जो मोटा तो था
और बिल्कुल भी आकर्षक नही था...अतः गरिमा की नज़र जिस तरह घूमते हुए उस लड़के तक गयी थी वैसे ही घूमते हुए वापस अ गयी।
सफ़र शुरू हुए एक घंटे गुज़र चुके थे..कुछ देर बाद गरिमा की नज़र फिर उस तरफ गयी इसबार एक खूबसूरत स लड़का उस सीट पर बैठा था...जो
खुद भी गरिमा की तरफ ही देख रहा था...अब गरिमा की आँखे परेशान हो गयी...पहले तो वो समझ न पायी इस क्रिया की क्या प्रतिक्रिया दे। फिर कुछ देर बाद गरिमा भी उसकी ओर देखने लगी....और देखते ही देखते न जाने कब आँखे चार हो गयी प्रिया का खुद पर कंट्रोल न रहा था...वो चाह रही थी ये लम्हा हमेशा के लिये ठहर जाये...उस पल आंखो ही आंखो मे न जाने कितनी बाते कर लि थी दोनो ने...अगर कोई कोई कमी थी तो बस लफ़्ज़ों पर आँखो ने उसकी कमी भी पूरी कर दी थी...कभी गरिमा उस अनजान शख़्स से नज़र चुराकर खुद को सवंरती तो एक नज़र अपने पापा की ओर डालती ओर फिर घूम कर उसके पास अ जाती...जैसे कहना चाहती हो मुझे अपनी  बाहों मे हमेशा के लिये भर लो...और प्यार की इस दो पल की लुका छिपी मे न जाने कब स्टेशन अ गया और ये प्यार का किस्सा कानपुर स्टेशन से शुरू होकर
इलाहबाद स्टेशन पर खत्म हो गया....ट्रेन से उतरने के बाद एक बार और नज़रें मिली फिर मंज़िल जुदा हो गयी।।


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