"उस मुलाक़ात के बाद" भाग-2

                   "उस मुलाक़ात के बाद"


अरमान और रिद्धिमा एक ऑटो में सवार होकर एक सफ़र में तो निकल गए, लेकिन अभी इस मंज़िल में टकराव बहुत थे क्योकि प्यार का सफ़र आसान नही होता....

बहुत सी बाते जो अनकही थी, बहुत सी बाते जो रिद्धिमा को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी, बहुत सी एक्सपेक्टेशंस जो अरमान रिद्धिमा से रखना चाह रहा था।

अरमान और रिद्धिमा उस दिन ऑटो में बैठकर एक रेस्टोरेंट में गए, ये वो रेस्टोरेंट था जहां अरमान अक्सर आया करता था।
दोनों कॉर्नर की सीट में बैठ गए, पहले तो अरमान ने कल रात के लिए सॉरी बोला,उसे लगा उसने अपने दिल कि बात कहने में थोड़ा जल्दी कर दी , रिद्धिमा ने जवाब में कहा कोई बात नही लेकिन अरमान मै वो नहीं हूं जिसे तुम प्यार करो, मै चाहती भी नहीं हूं कि कोई मुझे प्यार करे, मुझे ये सब बिल्कुल भी पसंद नहीं है। मुझे अकेले रहना पसंद है, मै तब तक इन सब चक्करों में नहीं पड़ना चाहती, जब तक मै कुछ कर नहीं लेती, अपने लिए अपने सपनों के लिए...

शायद इस वजह से ही रिद्धिमा बिल्कुल नॉर्मल सी बनकर अाई थी और एग्जाम देने के बाद उसके पूरे चेहरे पर इंक लग गई थी..
उसको देखकर लग ही नहीं रहा था, कि वो एग्जाम के बाद किसी ऐसे लड़के से मिलने जा रही हैं, जिसने कल रात बातो ही बातो में उसे प्रपोज कर दिया था और उसपर रिद्धिमा का  रिएक्शन अनएक्सपेक्टेड था।

अरमान के प्रपोज करने के बाद तो रिद्धिमा को उसे उस वक़्त ही कॉल करके दो तीन सुना देनी चाहिए थी या फिर उसे हमेशा के लिए ब्लॉक कर देना चाहिए था, जैसे रिद्धिमा अब तक करती आयी थी,
लेकिन कुछ तो था उस पल उस लम्हे में , जो रिद्धिमा चाह कर भी वो नहीं कर पाई जो हमेशा से करती आ रही थी।

लफ्जो से तो नहीं लेकिन आंखों से सब बयां जो जाता कैसे उसकी ना में हां छुपी थी।

शायद अरमान ने उसकी आंखों में सब पढ़ लिया था और उस दिन ही ये तय कर लिया था ज़िन्दगी इसके साथ गुजरना है, वरना किसी के साथ नहीं।।

ऐसे कई दिन गुज़र गए रिद्धिमा अब बिल्कुल फ्री थी, ना ही एग्जाम की टेंशन और न ही कहीं आने जाने की टेंशन, वो सारा समय अरमान को ही दे रही थी, अरमान और रिद्धिमा अब सारा दिन बात किया करते थे, कभी अभी अरमान अपनी तस्वीर भेजता तो कभी अपनी लिखी नज़्म सुनता।

और दिन महीने में गुज़र गए बहुत समय बाद अरमान ने रिक्वेस्ट की, की वो रिद्धिमा से फिर से मिलना चाहता है।

गर्मी की छुट्टियों में रिद्धिमा अक्सर अपनी नानी के घर जाया करती थी, वहां उसकी एक बड़ी दीदी भी थी, जिससे वह अपने सारे राज शेयर करती थी।

रिद्धिमा ने अरमान के बारे में 'दी' को बताया तो दी ने सलाह दी कि उसे मिलने जाना चाहिए, रिद्धिमा ने अरमान को हां बोल दी और ये तय हुआ कि  वो पास के मॉल में मिलेंगे।

आज रिद्धिमा सुबह से ही परेशान भी थी और खुश भी, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या पहने और क्या नहीं, कभी बाल संवरती तो कभी धूप का चश्मा लगाकर, खुद को आईने में निहारती, तो कभी घड़ी की ओर देखती कहीं टाइम तो नहीं हो गया।

मॉल जाने के लिए वाह एक घंटा पहले निकल गई क्योंकि रास्ते में ट्रैफिक बहुत ज्यादा होता था, उधर अरमान का भी यही हाल था, कौन सी शर्ट अच्छी लगेगी कौन सी नहीं, कही रिद्धिमा उसकी शर्ट के कलर को नापसंद न कर दे।

फ़िलहाल इन सब उलझनों को सुलझा के दोनो अपने अपने घर से निकल गये....

दोनों ही सही समय में मॉल  के गेट पर पहुंच गए और साथ में ही अंदर गए, अरमान ने मॉल में बने रेस्टोरेंट की तरफ इशारा किया और दोनों लोग एक टेबल पर बैठ गए, वो बाहर एक दूसरे से बात नही  करते थे क्योकि दोनो एक ही शहर के थे, कहाँ कौन जानने वाला मिल जाएं पता नही होता।

कुछ देर तक दोनों  इधर उधर की बाते करते रहे कभी चुपके से रिद्धिमा अरमान को देखती, तो कभी अरमान रिद्धिमा को कुछ देर बाद अरमान ने अचानक से चारु से बोला, अपना हाथ दो, रिद्धिमा ने पहले मना कर दिया, उसको अजीब सा लगा थोड़ी देर बाद पता नहीं क्या सोच कर धीरे से हाथ आगे बढ़ा दिया अरमान ने रिद्धिमा का हाथ पकड़ा उसकी आंखो में आंखे डालकर बोला -

रिद्धिमा.... नही बाबू मै तुमसे प्यार करता हूं और अपनी पूरी जिंदगी तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूं।

रिद्धिमा मन ही मन बहुत खुश हुई लेकिन होठो से कुछ कह न पाई और अपना हाथ पीछे खीच लिया अरमान शायद उसके संकोच को समझ गया, कुछ देर के लिये मौहल बिल्कुल शांत हो गया, फ़िर अरमान ने हिम्मत करके चुप्पी तोड़ी और बोला कुछ खाओगी या आज ऐसे ही शांत बैठने का इरादा है। इसपर रिद्धिमा ने मुस्कुरा दिया अरमान ने जल्दी से कुछ खाने को ऑर्डर किया और उस दिन दोनों ने जमकर खाया लेकिन रिद्धिमा ने अभी तक अरमान की बात का जवाब नहीं दिया, अरमान ने भी रिद्धिमा पर ज्यादा प्रेशर नहीं डाला, क्योंकि वो रिद्धिमा को प्यार से पाना चाहता था जबरदस्ती करके नहीं।

स्वाति की कलम से - "उस मुलाक़ात के बाद" 

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