"एक बार फिर" भाग -6
एक बार फिर
पहला प्यार पूरा हो या न हो लेकिन एक बार लौट के जरूर आता है।...
एक साल गुज़र गये अरमान और रिद्धिमा को अलग हुए लेकिन न जाने क्यो रिद्धिमा को कभी कभी अचानक अफसोस होता था की उसे ऐसा नही करना चाहिये था, अरमान जैसा प्यार करने वाला लड़का कहाँ मिलेगा और ये सोचकर उसे रात रात भर नींद नही आती...
दिल और दिमाग के खेल में उलझी रिद्धिमा बहुत परेशान हो गई थी...
कभी वह खुद से कहती रिद्धिमा तेरे लिये तेरा कैरियर पहली चाहत है, एक बार तू कुछ बन गई फिर तो ये सब होता रहेगा और उसका दिल कहता स्वाति अब नही तो कब, रिद्धिमा दिल और दिमाग मे पहले ही फर्क करना नही जानती थी और अब वह दोनो के बीच में उलझ भी गई थी....कभी आईने मे खुद को देखती तो बस एक ही सवाल आता, क्या कोई इस चेहरे पर भी फिदा हो सकता है।
उसे कभी ऊपर वाले से शिकायत तो नही की थी लेकिन अपने लिए कुछ सोचकर रखा था, एक बार जब वह कमाने लगेगी तो वो अपने दाँतो को ठीक करवा लेगी।
आज तक लोग रिद्धिमा से काम के मतलब से ही बात करते थे कभी कोई दोस्त से ज़्यादा उसके बारे में नही सोचता और अति तो तब हो जाती जब उसके ही दोस्त उसे अनदेखा कर दिया करते थे....
रिद्धिमा सारी बाते अपनी दिमाग में चल रही सारी उठा पटक को कलम जरिये पन्नो पर व्यक्त किया करती थी....
"पहचानने वाले पहचान जायेंगे और
न जानने वाले जान जायेगे
तुझे देखकर मुहँ घुमाने वाले
कल तेरे पीछे पीछे आयेंगे।।"...
एक दिन रिद्धिमा ने पूछा तुम दिखते तो अच्छे हो तो फिर अपनी अच्छी फोटो फेसबुक पर क्यों नहीं डालते तो अरमान ने जवाब दिया कि , अच्छी फोटो डालने से लड़कियां पीछे पड़ जाती है इस पर रिद्धिमा बहुत हंसी थी और इस बात को याद करके रिद्धिमा को अरमान कि याद एक बार फिर आ गई उसको याद आया अरमान ने उसे अपना नंबर दिया था....
उसने अरमान को व्हाट्स ऐप पर मैसेज किया...
हाय अरमान!
कैसे हो?
उधर से रिप्लाई आया -
अच्छा हूं तुम बताओ कैसी हो?
रिद्धिमा - मै अच्छी हूं बस उस दिन अचानक ब्लॉक करने के लिए सॉरी बोलना था।
अरमान - अरे सॉरी तो मुझे बोलना था जो मैंने तुम्हे उस दिन इतना इंतजार करवाया और गुस्से में न जाने क्या क्या बोल गया।
रिद्घिमा नेखुश रहती है, अरमान जिस तरह से बातें करता है उसे खुद से प्यार हो जाये....
एक बार बातो ही बातो में रिद्धिमा ने अरमान से पूछा की वो उसे इतना प्यार क्यो करता है, तो अरमान ने बोला जो बात मैंने देखी है, किसी और को दिख जाती तो वो भी तुमसे उतना ही प्यार करने लगता जितना की मै....और मुस्कुराकर चला गया, रिद्धिमा सोचती रह गई आखिर ऐसा क्या है, मुझमे जो मुझे ही नज़र नही आता।
अरमान और रिद्धिमा की लव स्टोरी चल पड़ी थी, रिद्धिमान दिल दिमाग का खेल खत्म कर चुकी थी अब वह प्यार में मामले में सिर्फ दिल से सोचती थी और काम दिमाग से करती थी और खुश रहती थी....इस पर भी उसने कुछ लिखा था-
कौन हो तुम?
कोई गीत जिसको सुनते रहने का मन करता है
य कोई नगमा जिसको न गुनगुनाओ
तो शाम का चंद फीका फीका लगता है
शायद तुम किसी कहानी का कोई हसीन किस्सा हो
य डूबते सूरज का ठंडा स पारा हो
जब तुमको महसूस करती हूँ
तो कड़कड़ाती ठंड भी
गुन गुनी धूप सी लगने लगती है
और आग बरसाता सूरज
बर्फ की हल्की बारिश सा लगता है।
आखिर हो कौन तुम??
क्यो तुमको जान नही प रही हूँ
क्यो खुद से जोड़ नही पा रही हूँ
क्यो तुम्हारी बातो की बाढ़
मे डूबती चली जा रही हूँ।
शायद कोई तन्हा स साथ हो
य भीड़ वाली गली मे
मेरा हाथ थामे हुऐ
मेरे दोस्त मेरे हमसफर
हक जमा बैठे हो....
मेरी रुह मेरी परछायी
आखिर हो कौन तुम?
चलो मैं तो समझ
नही प रही
तुम्ही ही बता दो
तुम तो बस हर
बात पर मुस्कुरा देते हो
हर सवाल पर एक सलाह देते हो
कभी कभी बहुत गुस्सा आता है तुम पर
फिर तुम्हारी मीठी बातो से चला भी जाता है
खुद बताते नही मुझे जानने देते नही
कभी लगता है
सुबह का कोहरा हो
जो सूरज के चढ़ते ही ढ़ल जाता है
कभी बदलता मौसम हो
जो मेरे मिजाज के साथ बदल जाता
तुम ख़ुदा हो य इबादत हो
पता नही शायद तुम इस नदान दिल की,
नादान सी आदत हो
प्यार हो तुम
यार हो तुम
सुबह हो तुम
शाम हो तुम
एक पहर हो तुम
या अनजान स शहर हो तुम
राहत हो
फुर्सत हो
सिकवा हो
य गिला हो
कौन हो तुम
क्या इनका मिला जुला सार हो तुम
अच्छा, तो तुम बेबाक जिंदगी हो
जो बिन परवाह के बस चलती
ही ज रही हैं
जो मेरे सवालो
पर उसूलो के तीर चला देती है
मुझे हर पल कुछ नया सिखाती हैं
हारने को जितने का हुनर बताती हैं
और कुछ ऐसे ही कई सवालो का
सैलाब बनकर जीने का एक मकसद दे जाती है।।
आगे के भाग में पढ़े क्या अरमान और रिद्धिमा अपने रिश्ते को जिंदगी के उस पड़ाव तक ले जा पाएंगे जिस पड़ाव तक हर प्रेमी युगल को पहुंचने कि तम्मना होती है, क्या इन दो प्यार करने वालो को उनके घर वाले उनकी मर्ज़ी के अनुसार अपना लेंगे या फिर एक बार फिर से ये दोनों इस जालिम दुनिया के शिकार बनकर रह जाएंगे।।
स्वाति की कलम से - एक बार फिर
पहली मुलाक़ात का भाग 6...

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